Supreme Court Notice To Centre And States On Plea To Tackle Digital Divide Among School Children -...



न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 28 Aug 2020 03:51 AM IST





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सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कोरोना महामारी के कारण स्कूल जाने वाले बच्चों के बीच भेदभाव और ‘डिजिटल विभाजन’ से निपटने के  लिए ‘समान शिक्षा प्रणाली’ को अपनाने की मांग वाली याचिका पर केंद्र और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया है।

सीजेआई एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने गैर सरकारी संगठन गुड गवर्नेंस चैंबर्स की जनहित याचिका पर केंद्र और सभी राज्यों से जवाब मांगा है।

वकील दीपक प्रकाश के जरिये दाखिल याचिका में कहा गया कि कोविड -19 के समय में प्राथमिक शिक्षा को रेगुलेट करने के लिए उठाए गए कदम न केवल नाकाफी हैं बल्कि बच्चों के बीच असमानता भी पैदा कर रहे हैं।

इस वजह से समाज के कमजोर वर्ग के बच्चे बेहद नुकसान की स्थिति में हैं। अभी डिजिटल विभाजन की स्थिति बनी हुई है  काफी संख्या में बच्चे ऑनलाइन क्लास करने में असमर्थ हैं। याचिका में छह से 14 वर्ष की आयु के बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा से संबंधित मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए उचित निर्देश देने की मांग की गई है।

इसमें कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत मिले समानता के मौलिक अधिकार और बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा अधिनियम, 2009 के तहत बच्चों को शिक्षा देना सुनिश्चित किया गया है।

याचिका में गुहार लगाई गई कि अदालत ऑनलाइन क्लास से महरूम रह रहे बच्चों और ई-लर्निंग प्रोग्राम पाने में असमर्थ बच्चों को ध्यान में रखते हुए वैकल्पिक उपाय सुनिश्चित करे।

याचिका में यह भी कहा गया कि लॉकडाउन की वजह से भारी संख्या में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी के कारण बच्चों की शिक्षा बुरी तरह प्रभावित हुई है। ऐसे बच्चों के ड्रॉपआउट होने की भी आशंका है। लिहाजा इस संबंध में भी दिशा-निर्देश जारी किया जाना चाहिए।

याचिका में कहा गया है कोरोना के कारण लोगों के समक्ष जीवन-मरण का संकट उत्पन्न हो गया है और शिक्षा दूसरी प्राथमिकता बन गई है। कमजोर वर्ग के लोग अपने बच्चों को ऑनलाइन क्लास दिलाने में असमर्थ है क्योंकि उनके पास स्मार्टफोन आदि नहीं है।

यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सभी छात्रों को शिक्षा का अवसर प्रदान हो, चाहे वह कमजोर वर्ग का ही क्यों न हो। यह सरकार की असफलता है कि उसने कमजोर वर्ग के बच्चों को होने वाली परेशानी की ओर ध्यान नहीं दिया। याचिका में बाल अधिकारों से जुड़े संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का भी हवाला दिया गया।



सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कोरोना महामारी के कारण स्कूल जाने वाले बच्चों के बीच भेदभाव और ‘डिजिटल विभाजन’ से निपटने के  लिए ‘समान शिक्षा प्रणाली’ को अपनाने की मांग वाली याचिका पर केंद्र और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया है।




सीजेआई एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने गैर सरकारी संगठन गुड गवर्नेंस चैंबर्स की जनहित याचिका पर केंद्र और सभी राज्यों से जवाब मांगा है।




वकील दीपक प्रकाश के जरिये दाखिल याचिका में कहा गया कि कोविड -19 के समय में प्राथमिक शिक्षा को रेगुलेट करने के लिए उठाए गए कदम न केवल नाकाफी हैं बल्कि बच्चों के बीच असमानता भी पैदा कर रहे हैं।

इस वजह से समाज के कमजोर वर्ग के बच्चे बेहद नुकसान की स्थिति में हैं। अभी डिजिटल विभाजन की स्थिति बनी हुई है  काफी संख्या में बच्चे ऑनलाइन क्लास करने में असमर्थ हैं। याचिका में छह से 14 वर्ष की आयु के बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा से संबंधित मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए उचित निर्देश देने की मांग की गई है।

इसमें कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत मिले समानता के मौलिक अधिकार और बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा अधिनियम, 2009 के तहत बच्चों को शिक्षा देना सुनिश्चित किया गया है।

याचिका में गुहार लगाई गई कि अदालत ऑनलाइन क्लास से महरूम रह रहे बच्चों और ई-लर्निंग प्रोग्राम पाने में असमर्थ बच्चों को ध्यान में रखते हुए वैकल्पिक उपाय सुनिश्चित करे।

याचिका में यह भी कहा गया कि लॉकडाउन की वजह से भारी संख्या में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी के कारण बच्चों की शिक्षा बुरी तरह प्रभावित हुई है। ऐसे बच्चों के ड्रॉपआउट होने की भी आशंका है। लिहाजा इस संबंध में भी दिशा-निर्देश जारी किया जाना चाहिए।

याचिका में कहा गया है कोरोना के कारण लोगों के समक्ष जीवन-मरण का संकट उत्पन्न हो गया है और शिक्षा दूसरी प्राथमिकता बन गई है। कमजोर वर्ग के लोग अपने बच्चों को ऑनलाइन क्लास दिलाने में असमर्थ है क्योंकि उनके पास स्मार्टफोन आदि नहीं है।

यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सभी छात्रों को शिक्षा का अवसर प्रदान हो, चाहे वह कमजोर वर्ग का ही क्यों न हो। यह सरकार की असफलता है कि उसने कमजोर वर्ग के बच्चों को होने वाली परेशानी की ओर ध्यान नहीं दिया। याचिका में बाल अधिकारों से जुड़े संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का भी हवाला दिया गया।





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