matangini hazra the freedom fighter nightmare for british government- Navbharat Times Photogallery

Web Title:matangini hazra the freedom fighter nightmare for british government

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​मतंगिनी हजरा: ...जब 72 साल की बूढ़ी औरत से डर गए अंग्रेज, गोलियों से भूना

​मतंगिनी हजरा: ...जब 72 साल की बूढ़ी औरत से डर गए अंग्रेज, गोलियों से भूना

70 साल की उम्र तक आते-आते ज्यादातर इंसान को चलने-फिरने तक के लिए दूसरे के सहारे की जरूरत होती है। लेकिन देशभक्ति का जज्बा वह ताकत है जो इंसान को 100 साल की उम्र में भी एक नई ऊर्जा देती है। यही हालत मतंगिनी हजरा की थी। 72 साल की उम्र में भी उन्होंने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। उनके विरोध और देशभक्ति की ताकत का आलम यह था कि अंग्रेज उनसे डरने लगे। एक बूढ़ी औरत से अंग्रेज इतना डर गए कि उनको गोलियों से छलनी करवा दिया। गोलियों से छलनी होने के बाद भी उन्होंने तिरंगा को झुकने नहीं दिया और 'वंदे मातरम' गाते हुए जान दे दी। आइए आज उस वीरांगना के बारे में सबकुछ जानते हैं...

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​परिचय

​परिचय

उनका जन्म एक छोटे से गांव होगला में 19 अक्टूबर, 1870 को हुआ था। होगला मिदनीपुर जिला के तमलूक शहर के करीब है। अपने पिता ठाकुरदास मेती की कमजोर आर्थिक हालत के कारण वह उचित शिक्षा नहीं हासिल कर पाईं। उनकी शादी अलिनन गांव के त्रिलोचन हजरा से हुई थी। वह उनसे उम्र में काफी बड़े थे। 18 साल की उम्र में वह विधवा हो गईं। उसके बाद उन्होंने अपना जीवन सामाजिक कार्यों को समर्पित कर दिया और दूसरों के लिए काम करने लगीं।

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​महात्मा गांधी से प्रेरित, स्वतंत्रता आंदोलन में कूदीं

​महात्मा गांधी से प्रेरित, स्वतंत्रता आंदोलन में कूदीं

1905 में राष्ट्रवादी आंदोलन बंगाल में जोरों पर था। मतंगिनी हजरा महात्मा गांधी से काफी प्रभावित हुईं। गांधीजी से प्रभावित होने के कारण उनको 'गांधी बुरी' कहा जाने लगा। वह महात्मा गांधी की बड़ी अनुयायी थीं।







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गिरफ्तारी

गिरफ्तारी

मिदनापुर में आजादी के आंदोलन की एक खास बात महिलाओं की भागीदारी थी। 1932 में उन्होंने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और नमक कानून तोड़ने के लिए उनको गिरफ्तार किया गया। उनको तुरंत छोड़ दिया गया लेकिन फिर टैक्स को हटाने के लिए विरोध किया। इस बार फिर उनको गिरफ्तार किया गया और बहरामपुर में छह महीने तक जेल में बंद किया गया। जेल में उन्होंने कई राजनीतिक कैदियों से भेंट की और स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल की। जेल से रिहा होने के बाद वह इंडियन नैशनल कांग्रेस की सक्रिय सदस्य बन गईं और चरखा कातने लगीं।

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​सर जॉन अंडरसन का विरोध

​सर जॉन अंडरसन का विरोध

साल 1933 में सर जॉन एंडर्सन तमलूक आया था। वह उस समय बंगाल का गवर्नर था। वहां वह एक सभा को संबोधित करने वाला था। एंडर्सन के लिए सुरक्षा के बहुत सख्त बंदोबस्त किए गए थे। उस सख्त सुरक्षा के बीच में भी वह काला झंडा लेकर डाइस के सामने पहुंच गईं।

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​गोली लगी पर झंडे को झुकने नहीं दिया

​गोली लगी पर झंडे को झुकने नहीं दिया

जब गांधीजी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया तो वह उनमें कूद पड़ीं। मिदनापुर जिले में कांग्रेसियों ने अंग्रेजों के खिलाफ प्रदर्शन का फैसला किया। मतंगिनी ने भी विरोध प्रदर्शन की स्थानीय लीडरों से अनुमति मांगी लेकिन महिला होने की वजह से उनको मना कर दिया गया। लेकिन वह रुकी नहीं और 29 सितंबर, 1942 को अंग्रेजों के खिलाफ एक जुलूस का नेतृत्व किया। जुलूस में करीब छह हजार प्रदर्शनकारी थे और ज्यादातर महिलाएं थीं। उनका मकसद तमलूक थाने पर कब्जा करना था। जब जुलूस शहर के करीब पहुंचा तो पुलिस को उनको तितर-बितर करने की जिम्मेदारी दी गई। ब्रिटिश सैनिकों ने ग्रामीणों को रुकने का आदेश दिया। जब वह नहीं रुकीं और अपना कदम आगे बढ़ाया तो उनको पहली बार गोली मारी गई। इसके बावजूद वह डटी रहीं और जितनी बार आगे बढ़ने की कोशिश की, उतनी बार उनको गोली मारी गई। गोलियों से उनका शरीर छलनी होता रहा, लेकिन वह वंदे मातरम का नारा लगाती रहीं। उन्होंने तिरंगे को झुकने नहीं दिया।

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​मतंगिनी हजरा की विरासत

​मतंगिनी हजरा की विरासत

मतंगिनी हजरा ने आजादी के आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा उन्होंने महिलाओं के महत्व से भी दुनिया को अवगत कराया। उन्होंने यह दिखाया कि महिलाएं कमजोर नहीं होती हैं। वे भी अपने पुरुष समकक्षों की तरह ही दुश्मन का डटकर मुकाबला कर सकती हैं। वह असीम साहस और नेतृत्व की प्रतिमा हैं।

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सम्मान

सम्मान

भारत को साल 1947 में अंग्रेजी शासन से आजादी मिली। आजादी के बाद उस वीरांगना के सम्मान में कई स्कूल, कॉलोनियों और गलियों का नाम रखा गया। 1977 में कोलकाता में उनकी पहली प्रतिमा स्थापित की गई। तमलूक में जहां वह शहीद हुई थीं, वहां उनकी एक प्रतिमा है। 2002 में भारत छोड़ो आंदोलन के 60 साल और तमलूक राष्ट्रीय सरकार के गठन की याद में डाक टिकट जारी किया गया। कोलकाता का हजरा रोड भी उनके ही नाम पर है।




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