(Hindi News from Navbharat Times , TIL Network)
2/8परिचय

उनका जन्म एक छोटे से गांव होगला में 19 अक्टूबर, 1870 को हुआ था। होगला मिदनीपुर जिला के तमलूक शहर के करीब है। अपने पिता ठाकुरदास मेती की कमजोर आर्थिक हालत के कारण वह उचित शिक्षा नहीं हासिल कर पाईं। उनकी शादी अलिनन गांव के त्रिलोचन हजरा से हुई थी। वह उनसे उम्र में काफी बड़े थे। 18 साल की उम्र में वह विधवा हो गईं। उसके बाद उन्होंने अपना जीवन सामाजिक कार्यों को समर्पित कर दिया और दूसरों के लिए काम करने लगीं।
3/8महात्मा गांधी से प्रेरित, स्वतंत्रता आंदोलन में कूदीं

1905 में राष्ट्रवादी आंदोलन बंगाल में जोरों पर था। मतंगिनी हजरा महात्मा गांधी से काफी प्रभावित हुईं। गांधीजी से प्रभावित होने के कारण उनको 'गांधी बुरी' कहा जाने लगा। वह महात्मा गांधी की बड़ी अनुयायी थीं।
4/8गिरफ्तारी

मिदनापुर में आजादी के आंदोलन की एक खास बात महिलाओं की भागीदारी थी। 1932 में उन्होंने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और नमक कानून तोड़ने के लिए उनको गिरफ्तार किया गया। उनको तुरंत छोड़ दिया गया लेकिन फिर टैक्स को हटाने के लिए विरोध किया। इस बार फिर उनको गिरफ्तार किया गया और बहरामपुर में छह महीने तक जेल में बंद किया गया। जेल में उन्होंने कई राजनीतिक कैदियों से भेंट की और स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल की। जेल से रिहा होने के बाद वह इंडियन नैशनल कांग्रेस की सक्रिय सदस्य बन गईं और चरखा कातने लगीं।
5/8सर जॉन अंडरसन का विरोध

साल 1933 में सर जॉन एंडर्सन तमलूक आया था। वह उस समय बंगाल का गवर्नर था। वहां वह एक सभा को संबोधित करने वाला था। एंडर्सन के लिए सुरक्षा के बहुत सख्त बंदोबस्त किए गए थे। उस सख्त सुरक्षा के बीच में भी वह काला झंडा लेकर डाइस के सामने पहुंच गईं।
6/8गोली लगी पर झंडे को झुकने नहीं दिया

जब गांधीजी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया तो वह उनमें कूद पड़ीं। मिदनापुर जिले में कांग्रेसियों ने अंग्रेजों के खिलाफ प्रदर्शन का फैसला किया। मतंगिनी ने भी विरोध प्रदर्शन की स्थानीय लीडरों से अनुमति मांगी लेकिन महिला होने की वजह से उनको मना कर दिया गया। लेकिन वह रुकी नहीं और 29 सितंबर, 1942 को अंग्रेजों के खिलाफ एक जुलूस का नेतृत्व किया। जुलूस में करीब छह हजार प्रदर्शनकारी थे और ज्यादातर महिलाएं थीं। उनका मकसद तमलूक थाने पर कब्जा करना था। जब जुलूस शहर के करीब पहुंचा तो पुलिस को उनको तितर-बितर करने की जिम्मेदारी दी गई। ब्रिटिश सैनिकों ने ग्रामीणों को रुकने का आदेश दिया। जब वह नहीं रुकीं और अपना कदम आगे बढ़ाया तो उनको पहली बार गोली मारी गई। इसके बावजूद वह डटी रहीं और जितनी बार आगे बढ़ने की कोशिश की, उतनी बार उनको गोली मारी गई। गोलियों से उनका शरीर छलनी होता रहा, लेकिन वह वंदे मातरम का नारा लगाती रहीं। उन्होंने तिरंगे को झुकने नहीं दिया।
7/8मतंगिनी हजरा की विरासत

मतंगिनी हजरा ने आजादी के आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा उन्होंने महिलाओं के महत्व से भी दुनिया को अवगत कराया। उन्होंने यह दिखाया कि महिलाएं कमजोर नहीं होती हैं। वे भी अपने पुरुष समकक्षों की तरह ही दुश्मन का डटकर मुकाबला कर सकती हैं। वह असीम साहस और नेतृत्व की प्रतिमा हैं।
8/8सम्मान

भारत को साल 1947 में अंग्रेजी शासन से आजादी मिली। आजादी के बाद उस वीरांगना के सम्मान में कई स्कूल, कॉलोनियों और गलियों का नाम रखा गया। 1977 में कोलकाता में उनकी पहली प्रतिमा स्थापित की गई। तमलूक में जहां वह शहीद हुई थीं, वहां उनकी एक प्रतिमा है। 2002 में भारत छोड़ो आंदोलन के 60 साल और तमलूक राष्ट्रीय सरकार के गठन की याद में डाक टिकट जारी किया गया। कोलकाता का हजरा रोड भी उनके ही नाम पर है।


0 Comments