What Is Sedition History Of Sedition Act In India Sedition Law Explain - क्या है...


राजद्रोह कानून
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स


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हाल ही के समय में देश में राजद्रोह कानून की बड़ी चर्चा हो रही है। पिछले कुछ समय से लगातार इस कानून के नाम पर लगातार बखेड़ा खड़ा हो रहा है। इसकी वजह भी है कि भारत में पिछले पांच सालों में औसतन 28 फीसदी सालना राजद्रोह के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है।

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हालांकि, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आधिकारिक आंकड़ें इससे भिन्न हैं, क्योंकि वहां प्रकरण को एक मूल श्रेणी यानी मुख्य अपराध में दर्ज किया जाता है। इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है कि देश में देश विरोधी गतिविधियां बढ़ गई हैं या फिर सरकार इतने गंभीर कानून का दुरुपयोग कर रही है, यह दोनों बातें लंबी बहस के विषय हैं। लेकिन हम बता दें कि देश में राजद्रोह कानून कोई नया कानून नहीं है।

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यह कानून ब्रिटिश शासनकाल से भारत में लागू है। कई और देशों में भी राजद्रोह का कानून है। कार्रवाई वहां भी होती है। लेकिन बखेड़ा सिर्फ हमारे देश में ज्यादा होता है। खैर, आइए आज हम जानते हैं कि क्या है राजद्रोह, क्या हैं इसके प्रावधान, कानूनी बंदिशें और फिर क्यों मचा है इस कानून पर बवाल, अगली स्लाइड्स में जानिए पूरा इतिहास... 


कानून क्यों चर्चा में? 
हाल ही में किसान आंदोलन के समर्थन देश की राजधानी दिल्ली में हुई 26 जनवरी, 2021 को किसान ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न हस्तियों द्वारा ट्वीट किए गए थे। इसे लेकर एक टूलकिट सामने आया था। इस संबंध में एक युवा प्रदर्शनकारी दिशा रवि की गिरफ्तारी की गई थी। हालांकि, बाद में शीर्ष न्यायालय ने उसे जमानत दे दी। लेकिन इस मामले ने एक बार फिर देश में राजद्रोह कानून को लेकर बहस छेड़ दी है। 


जानिए क्या है देशद्रोह?
भारतीय कानून संहिता यानी आईपीसी की धारा 124ए में दी गई परिभाषा के अनुसार, सरकार विरोधी सामग्री के लिखने, बोलने, प्रचारित-प्रसारित करने, उसका समर्थन करने या फिर राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नों और संविधान का अपमान करने की कोशिश करता है तो उसे तीन साल की सजा अथवा आजीवन कारावास हो सकता है। 


दुरुपयोग की आशंका 
सोशल मीडिया पोस्ट पर मौजूद सरकार के खिलाफ या सरकारी नीतियों के विरोध वाली पोस्ट को लाइक करने या फिर उसे शेयर करने, कई दफा कार्टून बनाने, शिक्षण संस्थानों में नाटक या प्ले की विषयवस्तु के खिलाफ भी इस कानून का इस्तेमाल किया गया है। आर्टिकल-14 वेबसाइट के डाटा के अनुसार, हालिया चर्चित मुद्दों जैसे- किसान आंदोलन से जुड़े प्रदर्शन पर 06 मामले, हाथरस प्रकरण से जुड़े 22, सीएए विरोधी प्रदर्शन पर 25 और पुलवामा हमले के बाद 27 मामले इस कानून के तहत दर्ज किए गए हैं। गौर करने योग्य बात यह है कि देश में राजद्रोह के मामलों में दोष साबित होने की दर 2014 के 33 फीसदी से घटकर 2019 में तीन फीसदी पर आ गई है। 


राजद्रोह कानून कब बना? 
1860 में बने इस कानून को 1870 के दशक में भारत में जब ब्रिटिश राज के दौरान लागू किया गया था। ऐसा कानून अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब, मलेशिया, सूडान, सेनेगल, ईरान, तुर्की और उज्बेकिस्तान में भी है। ऐसा ही कानून अमेरिका में भी है, लेकिन वहां के संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इतनी व्यापक है कि इस कानून के तहत दर्ज मुकदमे लगभग नगण्य हैं। जबकि ऑस्ट्रेलिया में सजा की जगह सिर्फ जुर्माने का प्रावधान है। 


इन दो देशों ने रद्द किया
राजद्रोह कानून न्यूजीलैंड और ब्रिटेन में भी था। दोनों जगह इसके दुरुपयोग को लेकर कई जोरदार आवाज उठी और सरकारों को यह कानून समाप्त करने पड़े। न्यूजीलैंड में 2007 में और ब्रिटेन में 2009 में इसे समाप्त कर दिया गया।


कहां मामले ज्यादा?
ऐसा नहीं है कि ये मामले केंद्र सरकार के हैं। ये केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों की ओर से दर्ज किए गए हैं। आर्टिकल-14 वेबसाइट पर मौजूद आंकड़े बताते हैं कि पिछले दशक में दर्ज कुल राजद्रोह के मामले के दो तिहाई पांच राज्यों बिहार, कर्नाटक, झारखंड, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में दर्ज हुए हैं। उस समय इनमें से बिहार, झारखंड और कर्नाटक में अधिकांश समय भाजपा समर्थित सरकार रही है।


राजद्रोह के चर्चित मामले
देश में राजद्रोह के दो सबसे चर्चित मामले हैं। इनमें से एक 2012 में तमिलनाडु के कुडनकुलम में परमाणु परियोजना संयंत्र का विरोध करने वाले करीब 9000 लोगों पर सामूहिक तौर पर राजद्रोह का केस दर्ज किया गया। इसके बाद 2017 में झारखंड राज्य में नक्सल समर्थित पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े लगभग 10 हजार लोगों पर राजद्रोह की धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। हालांकि, 2019 में ये मामले वापस ले लिए गए थे। 


मीडिया के खिलाफ भी हुआ इस्तेमाल 
कानून बनने के बाद 1891 में राजद्रोह के तहत पहला मामला बंगोबासी नामक समाचार पत्र के संपादक के खिलाफ दर्ज किया गया था। उन्होंने इस कानून की आलोचना में एक लेख प्रकाशित किया था। वहीं आजाद भारत में 1947 के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पत्रिका ऑर्गेनाइजर में कथित आपत्तिजनक सामग्री के खिलाफ भी इस कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था। ऐसे ही बाद में सरकार की आलोचना पर क्रॉस रोड्स नामक पत्रिका पर भी मुकदमा दर्ज किया गया था। 
 


संशोधन भी हुए 
ब्रिटिश शासन काल में इस कानून का मसौदा थॉमस बबिंगटन मैकाले ने तैयार किया था। मैकाले को भारत की शिक्षा प्रणाली का खाका तैयार करने का श्रेय भी दिया जाता है। उस दौर में ब्रितानी हुकूमत के लिए चुनौती बने वहाबी आंदोलन को रोकने के लिए इसे बनाया गया था। हालांकि, तब से अब तक इसमें कई बदलाव हुए हैं। जैसे- 1897 में लोकमान्य तिलक पर इस कानून के तहत मुकदमा दर्ज हुआ और ट्रॉयल के बाद 1898 में संशोधन कर धारा 124-ए को राजद्रोह की संज्ञा दी गई। जबकि आजादी के बाद इसमें से 1948 में ब्रिटिश बर्मा (अब म्यांमार) और 1950 में महारानी और ब्रिटिश राज तीनों शब्दों को हटाया गया था। इसके बाद 1955 में कालापानी की सजा का प्रावधान हटाकर उसे आजीवन कारावास में बदल दिया गया। 


कोर्ट में भी चुनौती मिली
इस कानून की वैधता को लेकर इसे अदालत में चुनौती भी दी गई। 1958 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस कानून को असंवैधानिक करार दिया। लेकिन 1962 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पुन: वैध ठहरा दिया। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने इसका दुरुपयोग रोकने के लिए कुछ शर्तें जोड़ दी थीं। 2018 में लॉ कमीशन ने भी इस पर कुछ प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी। इन सिफारिशों पर संसद के माध्यम से ही कानून में बदलाव किया जा सकता है। 





हाल ही के समय में देश में राजद्रोह कानून की बड़ी चर्चा हो रही है। पिछले कुछ समय से लगातार इस कानून के नाम पर लगातार बखेड़ा खड़ा हो रहा है। इसकी वजह भी है कि भारत में पिछले पांच सालों में औसतन 28 फीसदी सालना राजद्रोह के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है।


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हालांकि, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आधिकारिक आंकड़ें इससे भिन्न हैं, क्योंकि वहां प्रकरण को एक मूल श्रेणी यानी मुख्य अपराध में दर्ज किया जाता है। इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है कि देश में देश विरोधी गतिविधियां बढ़ गई हैं या फिर सरकार इतने गंभीर कानून का दुरुपयोग कर रही है, यह दोनों बातें लंबी बहस के विषय हैं। लेकिन हम बता दें कि देश में राजद्रोह कानून कोई नया कानून नहीं है।

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यह कानून ब्रिटिश शासनकाल से भारत में लागू है। कई और देशों में भी राजद्रोह का कानून है। कार्रवाई वहां भी होती है। लेकिन बखेड़ा सिर्फ हमारे देश में ज्यादा होता है। खैर, आइए आज हम जानते हैं कि क्या है राजद्रोह, क्या हैं इसके प्रावधान, कानूनी बंदिशें और फिर क्यों मचा है इस कानून पर बवाल, अगली स्लाइड्स में जानिए पूरा इतिहास... 






















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