बिजनस और लीगल टर्म में अकसर एक्ट ऑफ गॉड (act of god) वाक्यांश का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक्ट ऑफ गॉड क्या है, किस परिस्थिति को एक्ट ऑफ गॉड कहा जाता है, आज इसके बारे में सबकुछ जानेंगे...
M Salahuddin | नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated:
कानून की नजर में
एक्ट ऑफ गॉड की स्थिति में इंसान को कुछ जिम्मेदारी, कर्तव्य और काम से छुटकारा मिल जाता है। कानून की नजर में भी एक्ट ऑफ गॉड वह स्थिति है जो इंसान के बस से बाहर हो। इसको एक उदाहरण से समझ सकते हैं। कोई व्यक्ति किसी से किसी खास दिन मौजूद रहने और कुछ खास जिम्मेदारी निभाने का वादा करता है। लेकिन उस दिन तेज आंधी-तूफान आ जाता है जिस वजह से परिवहन का कोई साधन उपलब्ध नहीं होता है। ऐसे में वह अपने वादे को पूरा नहीं कर सकता है। चूंकि आंधी का आना और रोकना इंसान के बस से बाहर की बात है, इसलिए उसको एक्ट ऑफ गॉड माना जाएगा। इस स्थिति में वह इंसान वादा पूरा नहीं करने का दोषी नहीं कहा जा सकता है। भले ही उस काम को अंजाम देने के लिए कोई और समय तय किया जाए या रिफंड की व्यवस्था की जाए। अगर किसी प्रकार का दोनों के बीच करार हुआ है तो कानूनी तौर पर उस इंसान को काम नहीं होने के लिए जिम्मेदार बिल्कुल नहीं ठहराया जा सकता है।
दूसरा उदाहरण
एक कंपनी है जो सामानों की सप्लाई करती है। लेकिन हिमस्खलन की वजह से सारे रास्ते बंद हो गए जिससे वह क्लायंट को समय पर सप्लाई नहीं दे सकी। इस स्थिति में क्लायंट नुकसान की भरपाई के लिए मुकदमा नहीं कर सकता है।
2015 की घटना
2015 में पश्चिमी अफ्रीका के देशों में इबोला फैल गया था। मोरक्को को दो साल पर आयोजित होने वाले फुटबॉल टूर्नामेंट की उस साल मेजबानी करनी थी। लेकिन मोरक्को की सरकार ने एक्ट ऑफ गॉड या फोर्स मैज्योर का हवाला देते हुए टूर्नामेंट रद्द कर दिया। लेकिन कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट ने मोरक्को के दावे को खारिज कर दिया और कहा कि इबोला फोर्स मैज्योर की श्रेणी में नहीं आता है क्योंकि उस खतरनाक वायरस ने मेजबानी को असंभव नहीं बनाया था। मोरक्को को टूर्नामेंट रद्द करने का दोषी ठहराया गया और 1 मिलियन डॉलर जुर्माना लगाया गया। अगर इबोला को फोर्स मैज्योर मान लिया जाता तो मोरक्को को अपनी जिम्मेदारी से बचने का दोषी नहीं माना जाता।

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