अपने से 60 साल छोटे बच्चों के साथ क्लासरूम साझा करने में बेशक लालरिंगथारा को थोड़ा अजीब लगता है, पर अपने सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने इस हिचक को भी दूर कर दिया है.
2 साल की उम्र में छिन गया पिता का साया
1945 में भारत-म्यांमार बॉर्डर के करीब खुआंगलेंग गांव में जन्मे लालरिंगथारा ने दो साल की उम्र में ही अपने पिता को खो दिया. वो अकेली संतान थे, पिता के जाने के बाद वो अपनी मां का अकेला सहारा बन गए. बचपन से ही वो घर चलाने में मां की मदद करने लगे--घर के कामों से लेकर खेतों में काम करने तक, वो मां को अकेला नहीं छोड़ते. पिता का जाना और घर के हालात ने स्कूल छुड़वा दिया, लालरिंगथारा की पढ़ाई का सपना, सपना बनकर ही रह गया.
दिन में स्कूल और रात को चौकीदारीघर चलाने के लिए नौकरी की तलाश में लालरिंगथारा इधर-उधर भटकते, उनका कोई स्थाई ठिकाना नहीं होता. कुछ सालों पहले वो अपना गांव छोड़कर न्यू रुआईकॉन गांव में हमेशा के लिए बस गए. यहां वो एक चर्च में चौकीदार की नौकरी करने लगे पर पढ़ाई करने का उनका सपना उन्हें सोने नहीं देता. अपने सपने को पूरा करने के लिए आखिर उन्होंने स्कूल में दाखिला कराया, अब वो दिन में स्कूल जाते हैं और रात को चौकीदारी करते हैं.
अंग्रेजी बोलना और लिखना चाहते हैं
लालरिंगथारा मीज़ो भाषा में पढ़-लिख लेते हैं पर अंग्रेजी से उनका बड़ा लगाव रहा है, वो हमेशा से इस भाषा को बोलना और इसमें लिखना चाहते रहे हैं. पढ़ाई का जुनून और अंग्रेजी सीखने की इस धुन में ही लालरिंगथारा ने स्कूल में दाखिला कराया.
News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए करियर से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.
First published: April 10, 2018, 2:56 PM IST

0 Comments