ashfaqulla khan
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1/9जब धर्म के नाम पर अशफाकुल्ला को भड़काने पहुंचा एक पुलिसवाला, मिला था तगड़ा जवाब

अशफाकुल्ला खां भारत की आजादी की लड़ाई के उन हीरोज में से थे जिन्हें देशप्रेम की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी। 1925 के काकोरी कांड में उन्हें राम प्रसाद बिस्मिल के साथ फांसी दी गई थी। आज (22 अक्टूबर) को उनका जन्मदिन है, जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी कुछ सीख लेने वाली बातें...
2/9शाहजहांपुर में पैदा हुए थे अशफाक

अशफाकुल्ला खां 22 अक्टूबर, 1900 को शाहजहांपुर में पैदा हुए थे। उनके पिता का नाम शफीकुल्ला खां था जो एक सैन्य परिवार से थे। उनकी मां मजहरुननिशां बेगम एक धार्मिक महिला थीं जो एक शिक्षित परिवार से आती थीं। उनके ननिहाल के कई रिश्तेदार ब्रिटिश भारत में उच्च पदों पर थे। अशफाक अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थे।
3/9बिस्मिल से दोस्ती

अशफाकुल्ला का बड़ा भाई रियासतुल्ला खां और राम प्रसाद बिस्मिल एक साथ पढ़ते थे। एक षडयंत्र के आरोप में राम प्रसाद बिस्मिल को भगोड़ा घोषित कर दिया गया था। उसी दौरान रियासतुल्ला खां ने अशफाक को बिस्मिल के काम और शायरी के बारे में बताते थे। बिस्मिल शायर के रूप में पहचाने जाते थे। अशफाक उनकी तारीफ सुनते-सुनते उनके मुरीद हो गए और उनसे मिलना चाहते थे। अशफाक भी देश की आजादी के सपने देख रहे थे। बिस्मिल से मिलने का उनका काफी मन था। 1920 में जब बिस्मिल शाहजहांपुर आए तो अशफाक ने मिलने की कोशिश की लेकिन बिस्मिल ने उस समय ध्यान नहीं दिया था। दोनों के बीच 1922 में असहयोग आंदोलन के समय काफी घनिष्ठ संबंध बने।
4/9धर्म से बढ़कर देश

चौरी चौरा कांड के बाद जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया तो देश के बहुत से युवा को लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है। उन युवाओं में अशफाक भी शामिल थे। देश को आजाद कराने के उद्देश्य से वह बिस्मिल के करीब आए और आर्य समाज के सक्रिय सदस्य बन गए। बिस्मिल आर्य समाज के सक्रिय सदस्य थे और समर्पित हिंदू थे लेकिन वह हर धर्म को बराबर सम्मान देते थे। दूसरी ओर पक्के मुस्लिम होने के बावजूद अशफाकुल्ला का स्वभाव भी ऐसा ही थी। इससे दोनों गहरे दोस्त बन गए।
5/9काकोरी कांड की योजना

गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस लिया तो कुछ युवाओं को लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है। अशफाक भी उनमें से एक थे। वे हथियार के बल पर आजादी लेना चाहते थे। हथियार, बम आदि के लिए बड़ी मात्रा में पैसा चाहिए था। पैसा कहां से आएगा इसकी योजना राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में बनाई गई। एक दिन बिस्मिल शाहजहांपुर से लखनऊ ट्रेन से जा रहे थे। उन्होंने देखा कि हर स्टेशन पर स्टेशन मास्टर पैसे का थैला गार्ड को लाकर देता था और गार्ड ने कैश लखनऊ जंक्शन पर स्टेशन अधीक्षक को थमा दिया। वहीं से बिस्मिल के दिमाग में गार्ड से पैसा लूटने का विचार आया। उन लोगों ने 9 अगस्त, 1925 को योजना को अमलीजामा पहनाया। जब ट्रेन काकोरी में पहुंची तो रुकवाकर गार्ड और यात्रियों को कब्जे में ले लिया। इसके बाद वे नकदी लेकर फरार हो गए।
6/9जब पठान दोस्त ने की गद्दारी

इस घटना की जांच के लिए ब्रिटिश वायसराय ने स्कॉटलैंड यार्ड की सेवा ली। एक महीने की जांच के अंदर ब्रिटिश सरकार ने रातोंरात सभी क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। 26 सितंबर, 1925 की सुबह में शाहजहांपुर से बिस्मिल और दूसरों को गिरफ्तार किया गया। अशफाक किसी तरह फरार होने में कामयाब हो गए। वह वहां से बिहार चले गए जहां एक इंजिनियरिंग कंपनी में 10 महीने तक काम किया। अशफाक देश को आजाद कराने के लिए विदेश जाकर लाल हर दयाल से मिलना चाहते थे। वह दिल्ली पहुंचे और पता किया कि भारत से कैसे निकलना है। लेकिन उनके पठान दोस्त ने गद्दारी कर दी और पुलिस को उनके बारे में सूचना दे दी।
7/9हिंदू-मुस्लिम एकता की वकालत

हालांकि अशफाकुल्ला खां पक्के मुस्लिम थे और राम प्रसाद बिस्मिल का संबंध आर्य समाज से था, लेकिन दोनों पक्के दोस्त थे। जब वह जेल में थे तो तसद्दुक खां नाम के पुलिस अधीक्षक ने दोनों के बीच नफरत का बीज बोने का काम किया। उसने खुद के मुस्लिम होने का फायदा उठाना चाहा लेकिन मजबूत इरादे वाला अशफाक को वह डिगा नहीं सका। उस पुलिस ने उन्हें बिस्मिल के खिलाफ गवाही देने पर सजा माफ करवाने का लालच दिया पर अशफाक नहीं डिगे। अशफाकुल्ला खां ने गुस्से में उनसे कहा कि बिस्मिल मेरा भाई है और जवाब दिया, 'खां साहब, मुझे पूरा यकीन है कि ब्रिटिश भारत के मुकाबले कई गुना बेहतर होगा हिंदू भारत।'
8/9हो गई फांसी की सजा

उनको गिरफ्तार करके फैजाबाद जेल में हिरासत में रखा गया और उनके खिलाफ मामला दर्ज किया। उनके भाई रियासतुल्ला खां ने उस समय के नामी वकील कृपा शंकर हाजेला की मदद ली लेकिन अशफाक को बचा नहीं सके। अशफाक समेत चार क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई गई। 19 दिसंबर, 1927 को उनको फांसी की सजा दे दी गई।
9/9आजादी के लिए फांसी पर चढ़ने वाला पहला मुस्लिम

जब 19 दिसंबर, 1927 को अशफाकुल्ला को फांसी दी गई वह पहले मुस्लिम थे जिनको षडयंत्र के मामले में फांसी दी गई थी। राष्ट्र के नाम अपने आखिरी संदेश में उन्होंने लिखा, 'मुझे गर्व महसूस होता है कि अपने देश की आजादी के लिए फांसी के तख्ते पर झूलने वाला मैं पहला मुस्लिम हूं।'

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