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(Hindi News from Navbharat Times , TIL Network)
1/10लाला लाजपत राय जयंती: उनके बचपन की यह कहानी कर देगी भावुक

लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी, 1865 को फिरोजपुर, पंजाब में हुआ था। उनके पिता मुंशी राधा कृष्ण आजाद फारसी और उर्दू के महान विद्वान थे और माता गुलाब देवी धार्मिक महिला थीं। आइए उनके बारे में कुछ खास बातें जानते हैं और उनके बचपन की एक कहानी भी बताएंगे जिसे सुनकर आप भावुक हो जाएंगे...
2/10बड़े मूल्यों वाले व्यक्ति

1886 में लाला लाजपत राय का परिवर हिसार शिफ्ट हुआ था। वहां उन्होंने वकालत शुरू की। वहीं उन्होंने राष्ट्रवादी दयानंद ऐंग्लो वेदिक स्कूल की स्थापना की। वह आर्य समाज की स्थापना करने वाले दयानंद सरस्वती के अनुयायी बन गए।
3/10पंजाब नैशनल बैंक

पंजाब नैशनल बैंक की स्थापना में लाला लाजपत राय की अहम भूमिका थी।
4/10लाहौर से एलएलबी

उनके पिता राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, रेवाड़ी में शिक्षक थे। वहीं से उन्होंने प्राथमिक शिक्षा हासिल की। लॉ की पढ़ाई के लिए उन्होंने 1880 में लाहौर स्थित सरकारी कॉलेज में दाखिला लिया। 1886 में उनका परिवार हिसार शिफ्ट हो गया जहां उन्होंने लॉ की प्रैक्टिस की। 1888 और 1889 के नैशनल कांग्रेस के वार्षिक सत्रों के दौरान उन्होंने प्रतिनिधि के तौर पर हिस्सा लिया। हाई कोर्ट में वकालत करने के लिए 1892 में वह लाहौर चले गए।
5/10राष्ट्रवाद का जज्बा

बचपन से ही उनके मन में देश सेवा का बड़ा शौक था और देश को विदेशी शासन से आजाद कराने का प्रण किया। कॉलेज के दिनों में वह देशभक्त शख्सियत और स्वतंत्रता सेनानियों जैसे लाल हंस राज और पंडित गुरु दत्त के संपर्क में आए। लाजपत राय देश को आजाद कराने के लिए क्रांतिकारी रास्ता अपनाने के हिमायती थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नीति के वह खिलाफ थे। बिपिन चंद्र पाल, अरबिंदो घोष और बाल गंगाधर तिलक के साथ वह भी मानते थे कि कांग्रेस की पॉलिसी का नकारात्मक असर पड़ रहा है। उन्होंने पूर्ण स्वराज की वकालत की।
6/10राजनीतिक करियर

लाजपत राय ने वकालत करना छोड़ दिया और देश को आजाद कराने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। उन्होंने यह महसूस किया कि दुनिया के सामने ब्रिटिश शासन के अत्याचारों को रखना होगा ताकि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अन्य देशों का भी सहयोग मिल सके। इस सिलसिले में वह 1914 में ब्रिटेन गए और फिर 1917 में यूएसए गए। अक्टूबर, 1917 में उन्होंने न्यू यॉर्क में इंडियन होम रूल लीग की स्थापना की। वह 1917 से 1920 तक अमेरिका में रहे।
7/10जलियांवाला बाग हत्याकांड के खिलाफ उग्र आंदोलन

1920 में जब अमेरिका से लौटे तो लाजपत राय को कलकत्ता में कांग्रेस के खास सत्र की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया। जलियांवाला बाग हत्याकांड के खिलाफ उन्होंने पंजाब में ब्रिटिश शासन के खिलाफ उग्र आंदोलन किया। जब गांधीजी ने 1920 में असहयोग आंदोलन छेड़ा तो उन्होंने पंजाब में आंदोलन का नेतृत्व किया। जब गांधीजी ने चौरी चौरा घटना के बाद आंदोलन को वापस लेने का फैसला किया तो उन्होंने इस फैसले का विरोध किया। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस इंडिपेंडेंस पार्टी बनाई।
8/10निधन

संवैधानिक सुधारों पर चर्चा के लिए 1928 में साइमन कमिशन भारत आया। कमिशन में कोई भारतीय प्रतिनिधि नहीं होने के कारण भारतीय नागरिकों का गुस्सा भड़क गया। देश भर में विरोध-प्रदर्शन होने लगा और लाला लाजपत राय विरोध प्रदर्शन में आगे-आगे थे। 30 अक्टूबर, 1928 की घटना है। लाजपत राय लाहौर में साइमन कमिशन के आने का विरोध करने के लिए एक शांतिपूर्ण जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे। पुलिस अधीक्षक जेम्स ए.स्कॉट ने मार्च को रोकने के लिए लाठी चार्ज का आदेश दे दिया। पुलिस ने खासतौर पर लाजपत राय को निशाना बनाया और उसकी छाती पर मारा। इस घटना के बाद लाला लाजपत राय बुरी तरह जख्मी हो गए। 17 नवंबर, 1928 को हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया। उनके अनुयायियों ने इसके लिए पूरी तरह ब्रिटिश सरकार को दोषी ठहराया।
9/10बचपन की रोचक कहानी

एक बार स्कूल की ओर से पिकनिक का आयोजन हुआ। उसमें लाला लाजपत राय को भी जाना था। पिकनिक के लिए न उनके पास पैसे थे और न घर में सामान ताकि पिकनिक के लिए उनकी मां कुछ पकवान बनाकर दे सके। उनके पिता बेटा का दिल भी नहीं तोड़ना चाहते थे। वह पड़ोसी से उधार मांगने जाने लगे तो यह बात उन्होंने भांप ली। उन्होंने पिता से कहा, पिताजी! उधार के लिए मत जाइए, मैं वैसे भी पिकनिक पर नहीं जाना चाहता था। यदि जाना भी होगा तो घर में खजूर पड़े ही हैं, वही ले जाऊंगा। कर्ज लेकर शान दिखाना ठीक नहीं।
10/10सच साबित हुए उनके ये आखिरी शब्द

साइमन कमीशन के विरोध के वक्त उनको बुरी तरह उनके शरीर पर लाठियां मारी गई थीं। उन्होंने कहा था कि उनके शरीर पर मारी गई लाठियां हिंदुस्तान में ब्रिटिश राज के लिए ताबूत की आखिरी कील साबित होंगी। उनकी मौत के एक महीने बाद 17 दिसंबर 1928 को उनकी मौत का बदला लेते हुए ब्रिटिश पुलिस के अफसर सांडर्स को गोली से उड़ा दिया। उसके बाद भारत में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज और बुलंद हो गई।

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