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Web Title:the eventful days that decided the fate of kashmir

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इतिहास की अहम तारीखें, जब बदला J&K का भाग्य

इतिहास की अहम तारीखें, जब बदला J&K का भाग्य

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म होने के साथ ही 5 अगस्त, 2019 कश्मीर के इतिहास की एक अहम तारीख बन गई है। आइए आजादी के बाद से कश्मीर की उन अहम तारीखों के बारे में जानते हैं जब जम्मू-कश्मीर राजनीतिक और भौगोलिक बदलाव के दौर से गुजरा...

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कश्मीर पर कबायली हमला

कश्मीर पर कबायली हमला

कश्मीर पर कबायली घुसपैठ की पूरी साजिश पाकिस्तान के वरिष्ठ सैन्य अधिकारी अकबर खान के नेतृत्व में पाकिस्तानी सेना ने रची थी। अंग्रेजों के जाने के बाद पाकिस्तान ने कबायलियों को उकसाया। पाकिस्तान के उकसावे में आकर कबायली घुसपैठियों ने अक्टूबर 1947 के आखिरी हफ्ते में कश्मीर पर हमला कर दिया। करीब 5,000 कबायली घुसपैठी कश्मीर में घुस आए थे।

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​आगे बढ़े हमलावर

​आगे बढ़े हमलावर

कबायली हमलावर पाकिस्तान से आए थे। उनके पास आधुनिक सैन्य हथियार थे। उनका पहला मुकाबला डोगरा बटालियन के सैनिकों से मुजफ्फराबाद में हुआ और हमलावरों ने वहां कब्जा कर लिया। अगले दो दिनों में उनलोगों ने गढ़ी और चिनारी पर कब्जा कर लिया। हमलावरों का मुख्य गुट फिर उरी की ओर बढ़ा।







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​हमलावरों से भिड़े वीर सैनिक

​हमलावरों से भिड़े वीर सैनिक

उरी में जम्मू-कश्मीर राज्य की सेना का नेतृत्व कर रहे ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह मारे गए। वी.पी.मेनन अपनी किताब में लिखते हैं, 'वह और उनके साथ सैनिक इतिहास में हमेशा जिंदा रहेंगे। वे इतिहास में वीर लेओनिदास और उनके 300 सैनिकों की तरह ही जिंदा रहेंगे जिन्होंने थर्मोपाइले में पारसी हमलावरों का सामना किया था।' उरी का युद्ध काफी अहम था क्योंकि उससे महाराजा हरि सिंह को समय मिल गया और भारत से अधिक सेना को वह बुला सके। उरी के युद्ध के बाद कबायली हमलावर झेलम नदी से बारामूला की ओर आगे बढ़े जो घाटी के लिए प्रवेश केंद्र है।

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​महाराजा हरि सिंह का आग्रह

​महाराजा हरि सिंह का आग्रह

24 अक्टूबर को महाराजा हरि सिंह ने भारत सरकार से मदद की अपील की। उन्होंने भारत सरकार के जवाब का इंतजार किया। उधर दिल्ली में कैबिनेट की रक्षा कमिटी की बैठक हुई। प्रशासकीय प्रमुख और राज्य विभाग के सचिव वी.पी.मेनन को 25 अक्टूबर को श्रीनगर पहुंचने का आदेश दिया गया। मेनन की पहली प्राथमिकता महाराजा और उनके परिवार को श्रीनगर से सुरक्षित बाहर निकालना था। राजधानी की रक्षा के लिए सेना नहीं बची थी और हमलावर दरवाजे तक घुस आए थे। महाराजा हरि सिंह सड़क मार्ग से जम्मू के लिए रवाना हुए।

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कश्मीर में सेना भेजने का भारत का फैसला

कश्मीर में सेना भेजने का भारत का फैसला

26 अक्टूबर को कैबिनेट की एक डिफेंस कमिटी की बैठक के बाद सरकार ने सेना की दो टुकड़ियों को श्रीनगर भेजने का फैसला लिया। मेनन खुद हवाईजहाज से जम्मू गए जहां महाराजा हरि सिंह ठहरे हुए थे।

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​विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर

​विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर

तत्कालीन गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने कहा था कि विलय की प्रक्रिया पूरी होने से पहले सैनिकों को भेजना उचित नहीं होगा। वी पी मेनन महाराजा हरि सिंह के पास यह संदेश लेकर गए कि वह अगर कबायली आक्रमण को रोकना चाहते हैं तो उनको भारतीय संघ में शामिल होना पड़ेगा। उसके बाद महाराजा हरि सिंह भारत में विलय के लिए तैयार हो गए।

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​27 अक्टूबर 1947

​27 अक्टूबर 1947

मेनन 27 अक्टूबर को दिल्ली लौटे। साथ में विलय का पत्र और कानूनी दस्तावेज लेकर आए। कैबिनेट की डिफेंस कमिटी ने विलय को स्वीकार लिया। यह प्रावधान किया गया कि जब कानून-व्यस्था की स्थिति सामान्य होगी तो जनमत संग्रह किया जाएगा। शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर में इमर्जेंसी ऐडमिनिस्ट्रेशन का प्रभार संभाला। नेहरू ने कश्मीर के पूर्व पीएम एन.गोपालस्वामी अयंगर को कश्मीर मामले की देखरेख के लिए कैबिनेट मंत्री नियुक्त किया। अनुच्छेद 370 के अहम शिल्पकारों में से एक अयंगर थे।

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साल 1954

साल 1954

साल 1954 में जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में भारत के संविधान में राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से 35ए को जोड़ा गया। आर्टिकल 35ए जम्मू-कश्मीर विधानसभा को राज्य के 'स्थायी निवासी' की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है। इसके तहत जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को कुछ खास अधिकार दिए गए थे।

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5 अगस्त, 2019

5 अगस्त, 2019

जम्मू-कश्मीर के इतिहास में 5 अगस्त, 2019 का खास महत्व होगा। इसी दिन जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाया गया। जम्मू-कश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांटने का फैसला लिया गया।










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